कब और कहां खोजा गया था दुनिया का पहला सफेद बाघ: क्यों रखता था हर रविवार उपवास ?
देखने में जितना सुन्दर है उससे कहीं ज्यादा खतरनाक भी है। गोली की रफ्तार से भी तेज भागने वाला, शरीर पर काली लकीरें, चमकती आँखें फुर्ती और तेजी इतनी की पलक झपकते ही शिकार को पकड़ लें। यह जानवर कोई और नहीं बाघ ही है। दुनिया में बाघ दो प्रकार के पाये जाते हैं, पीले रंग के और सफेद रंग के। आज बात करते हैं दुनिया के पहले सफेद बाघ के बारें में। इसकी आदतों से यह जानवर बिल्कुल भी नहीं लगता था।
बता दें कि दुनिया का सबसे पहला सफेद बाघ साल 1951 में मध्य प्रदेश के रीवा जंगल में रीवा के महाराजा मार्तंड सिंह ने खोजा था।

यह माना जाता है कि सफेद बाघ 16वीं शताब्दी से ही भारत में मौजूद हैं, लेकिन इन्हें देखना बहुत दुर्लभ था। आज, इन खूबसूरत जानवरों को कई वन्यजीव अभयारण्यों में आसानी से देखा जा सकता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया का पहला सफेद बाघ कौन था? उसका नाम था मोहन, और उसकी कहानी बहुत ही दिलचस्प है।
महल में आते ही, मोहन की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। वह सभी के आकर्षण का केंद्र बन गया और उसे एक राजकुमार की तरह पाला गया। महल के कर्मचारी भी उसे प्यार से 'राजकुमार मोहन सिंह' बुलाते थे।

कई सालों बाद, 1976 में मोहन के आखिरी वंशज, विराट नामक सफेद बाघ का भी निधन हो गया। इसके साथ ही, रीवा से सफेद बाघ लगभग लुप्त हो गए थे।

क्या आप जानते हैं कि रीवा के महाराजा मार्तंड सिंह के नाम पर एक व्हाइट टाइगर सफारी भी है ?
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रीवा के महाराजा के लाडले, दुनिया के पहले सफेद बाघ 'मोहन' की कहानी :
यह माना जाता है कि सफेद बाघ 16वीं शताब्दी से ही भारत में मौजूद हैं, लेकिन इन्हें देखना बहुत दुर्लभ था। आज, इन खूबसूरत जानवरों को कई वन्यजीव अभयारण्यों में आसानी से देखा जा सकता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया का पहला सफेद बाघ कौन था? उसका नाम था मोहन, और उसकी कहानी बहुत ही दिलचस्प है।महाराजा मार्तंड सिंह को मोहित कर लिया था मोहन ने :
1951 में, रीवा के महाराजा मार्तंड सिंह को शिकार के दौरान एक अनोखा सफेद बाघ का शावक मिला। इस शावक की खूबसूरती और अनोखेपन से महाराजा इतने मोहित हो गए कि वे उसे अपने गोविंदगढ़ के शाही किले में ले आए।महल में आते ही, मोहन की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। वह सभी के आकर्षण का केंद्र बन गया और उसे एक राजकुमार की तरह पाला गया। महल के कर्मचारी भी उसे प्यार से 'राजकुमार मोहन सिंह' बुलाते थे।

मोहन की निराली आदतें: हर रविवार रखता था उपवास :
इतिहासकारों के अनुसार, मोहन की कुछ आदतें काफी अनोखी थीं। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि वह हर रविवार को उपवास रखता था। इस दिन वह मांस से दूर रहता था और सिर्फ दूध पीता था। मोहन की इस आदत ने उस समय के लोगों को काफी हैरान कर दिया था। महाराजा के बार-बार समझाने पर भी मोहन ने अपनी यह आदत कभी नहीं छोड़ी।मोहन का परिवार :
मोहन का स्वभाव बहुत चंचल था। जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसने सफेद बाघों की एक नई पीढ़ी को जन्म दिया। उसकी तीन पत्नियां थीं, जिनमें से एक का नाम राधा था। राधा और मोहन के सबसे पहले 4 सफेद शावक हुए। इसके बाद, मोहन का वंश बढ़ता गया और उसके कुल 34 शावक हुए, जिनमें से 21 सफेद बाघ थे। इन शावकों में से कई को भारत और विदेश के चिड़ियाघरों में भेजा गया।एक युग का अंत: मोहन का निधन :
19 दिसंबर 1969 को, 19 साल की उम्र में मोहन का निधन हो गया। उसे पूरे राजकीय सम्मान के साथ गोविंदगढ़ किले के बगीचे में दफनाया गया और उसकी समाधि भी बनाई गई। मोहन की मृत्यु के साथ एक युग का अंत हो गया।Read More: प्यार की खातिर 9 किलोमीटर का संघर्ष
कई सालों बाद, 1976 में मोहन के आखिरी वंशज, विराट नामक सफेद बाघ का भी निधन हो गया। इसके साथ ही, रीवा से सफेद बाघ लगभग लुप्त हो गए थे।

मोहन की विरासत को पुनर्जीवित करने का प्रयास :
इतिहासकारों के मुताबिक, 2016 से मोहन की विरासत को पुनर्जीवित करने के प्रयास जारी हैं। इसी कड़ी में, गोविंदगढ़ में महाराजा मार्तंड सिंह देव व्हाइट टाइगर सफारी में विंध्य नामक एक सफेद बाघिन को लाया गया है ताकि रीवा में सफेद बाघों की आबादी को फिर से बढ़ाया जा सके।क्या आप जानते हैं कि रीवा के महाराजा मार्तंड सिंह के नाम पर एक व्हाइट टाइगर सफारी भी है ?
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